अहम् से ब्रह्म तक · Part 01
📍 शारदा तपोवन, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड | अद्वैत जागरण शिविर
"अहम् से ब्रह्म तक"
PART — 01
सदाशिव समारम्भाम् शंकराचार्य मध्यमाम्। अस्मदाचार्य पर्यन्ताम् वन्दे गुरु परम्पराम्॥
जीवन में कुछ दिन ऐसे होते हैं जो केवल कैलेंडर की तारीखों की तरह आते हैं और चले जाते हैं। लेकिन उसी कैलेंडर के कुछ दिन हमारे भीतर एक अमिट चित्र खींच जाते हैं। उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल की हसीन वादियों में बसे शारदा तपोवन में बिताए गए कुछ दिन मेरे लिए कुछ ऐसे ही थे।
मैं वहाँ आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास (मध्य प्रदेश शासन, संस्कृति विभाग) द्वारा आयोजित अद्वैत वेदांत यूथ रिट्रीट (अद्वैत जागरण शिविर) में शामिल होने गया था। हिमालय की ताज़ी हवा, पहाड़ों की शांत ओट और अनुभवी आचार्यों का मार्गदर्शन — यह एक ऐसा अनुभव था जो मेरे जीवन के कुछ बेहद उच्च और कीमती दिनों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया है।
वह एक सवाल, जिसने भीतर हलचल मचा दी
शिविर में अगले दस दिनों तक पूरे भारत से आए हम करीब चालीस लोगों को वेदांत अद्वैत दर्शन पर प्राथमिक शिक्षा दी जाने वाली थी। पहले दिन, पहले ही चर्चा में जब पूज्य गुरुदेव स्वामी प्रबुद्धानंद सरस्वती जी ने हम सभी को देखते हुए एक बेहद सीधा, लेकिन गहरा सवाल पूछा —
"आप धार्मिक हैं या आध्यात्मिक?"
यह सवाल जब कानों से होता हुआ मेरे भीतर उतरा, तो जैसे मैं वहीं ठहर गया। इसने मेरे अंदर एक अजीब-सी हलचल पैदा कर दी। पढ़ने या सुनने में यह सवाल साधारण ही था, लेकिन जब स्वामीजी के सानिध्य में इस सवाल पर गहराई से विचार करना शुरू किया, तो मुझे हैरान करने वाला सच समझ आने लगा।
अब तक के अपने पूरे जीवन में इन दो शब्दों का अंतर जान ही नहीं पाया हूँ। हम में से अधिकांश लोग इन दोनों शब्दों को एक ही तराजू में तौलते हैं, और मेरी तरह दुनिया के लगभग 90% लोग केवल इन दो शब्दों के अंतर को न समझ पाने के फेर में फंसे हुए हैं।
धार्मिक vs आध्यात्मिक
इन दो शब्दों में जो स्पष्टता मुझे मिली, उसे मैं एक छोटी-सी कल्पना के ज़रिए आप तक पहुँचाना चाहता हूँ।
कभी किसी शाम टहलते-टहलते जब आप अपने गाँव या शहर में किसी ऊँचे स्थान पर पहुँच जाएँ, तो उस नज़ारे को एक लंबी साँस के साथ आँखें भरकर देख लीजिए। आप देखेंगे कि नीचे पेड़-पौधे, सड़कें, सड़कों पर गाड़ियाँ, गाड़ियों में लोग, पास ही कोई मकान या बिल्डिंग, बिल्डिंग की छत पर खेलते बच्चे — और दूर किसी मंदिर पर भगवा झंडा हवा में लहरा रहा है। यह नज़ारा देखकर आप हल्की मुस्कान के साथ थोड़े तनकर खड़े हो गए। सीना फुलाकर, दोनों हाथ बाँधकर, पूरे कॉन्फिडेंस के साथ।
बड़े आराम से गर्दन को 180 डिग्री घुमाकर चारों ओर का नज़ारा ले ही रहे थे कि ठीक सामने के चौराहे पर एक सफ़ेद रंग की SUV ने आपका ध्यान खींच लिया।
थोड़ा खिजियाते हुए अपने सीधे हाथ को उस कार की ओर हवा में लहराते हुए आपने कहा,
"अरे यार! अक्ल नहीं है क्या इसमें — क्यों लेफ्ट लेन ब्लॉक कर रहा है? बेवकूफ कहीं का... ये लोग पता नहीं कब सुधरेंगे। सिविक सेंस है ही नहीं, हान......!"
उस अनजान SUV ड्राइवर के साथ-साथ पूरे मानव समाज से नाराज़ होने के बाद आप धीरे से आँखें बंद कर अपना ध्यान वहाँ से हटाते हैं। तभी एहसास होता है कि हवा का एक झोंका आपको छूकर निकल गया। जो बालों के साथ ज़रा-सी मस्ती भी कर गया। आप बिखरे बालों को एक हाथ से सेट करते हुए सोचते हैं —
"यार, मुझे कभी लेफ्ट लेन ब्लॉक नहीं करनी है। कभी ट्रैफिक रूल नहीं तोड़ना है।"
इस विचार के बाद दोनों हाथ जेब में डालकर आप वापस उसी नज़ारे का आनंद लेने लगते हैं।
जब आपने उस SUV ड्राइवर और पूरे समाज में बदलाव की उम्मीद रखी — वह था धार्मिक विचार। बदलाव दूसरे में खोजना।
जब आपने खुद पर नियम मानने की बात रखी — वही था आध्यात्मिक विचार। बदलाव अपने भीतर खोजना।
आज के इस ब्लॉग में इतना ही। आने वाले दिनों में मैं अपने पूरे शिविर का अनुभव इस सीरीज़ "अहम् से ब्रह्म तक" के माध्यम से आप तक पहुँचाता रहूँगा।
"क्या आप इस यात्रा में शामिल होंना चाहते है?"
आचार्य शंकर की शिक्षाओं को आत्मसात करने और अद्वैत वेदांत को बेहतर तरह से समझने के लिए आप भी अद्वैत जागरण शिविर का हिस्सा बन सकते हैं। नीचे दिए लिंक पर जाकर फ़ॉर्म भरें। अधिक जानकारी के लिए Instagram या वेबसाइट पर विज़िट करें।
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"अहम् से ब्रह्म तक" सीरीज़ · Part 01 · अद्वैत वेदांत जागरण
Great
ReplyDeleteAgle din ke blog ka intezar rhega
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